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Genesis - -उत्पत्ति

अध्याय : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50

1 सांफ को वे दो दूत सदोम के पास आए : और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा या : सो उनको देखकर वह उन से भेंट करने के लिथे उठा; और मुंह के बल फुककर दण्डवत्‌ कर कहा;
2 हे मेरे प्रभुओं, अपके दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्रम कीजिए, और अपके पांव धोइथे, फिर भोर को उठकर अपके मार्ग पर जाइए। उन्होंने कहा, नहीं; हम चौक ही में रात बिताएंगे।
3 और उस ने उन से बहुत बिनती करके उन्हें मनाया; सो वे उसके साय चलकर उसके घर में आए; और उस ने उनके लिथे जेवनार तैयार की, और बिना खमीर की रोटियां बनाकर उनको खिलाई।
4 उनके सो जाने के पहिले, उस सदोम नगर के पुरूषोंने, जवानोंसे लेकर बूढ़ोंतक, वरन चारोंओर के सब लोगोंने आकर उस घर को घेर लिया;
5 और लूत को पुकारकर कहने लगे, कि जो पुरूष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहां हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ, कि हम उन से भोग करें।
6 तब लूत उनके पास द्वार बाहर गया, और किवाड़ को अपके पीछे बन्द करके कहा,
7 हे मेरे भाइयों, ऐसी बुराई न करो।
8 सुनो, मेरी दो बेटियां हैं जिन्होंने अब तक पुरूष का मुंह नहीं देखा, इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊं, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उन से करो : पर इन पुरूषोंसे कुछ न करो; क्योंकि थे मेरी छत के तले आए हैं।
9 उनहोंने कहा, हट जा। फिर वे कहने लगे, तू एक परदेशी होकर यहां रहने के लिथे आया पर अब न्यायी भी बन बैठा है : सो अब हम उन से भी अधिक तेरे साय बुराई करेंगे। और वे पुरूष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिथे निकट आए।
10 तब उन पाहुनोंने हाथ बढ़ाकर, लूत को अपके पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया।
11 और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरूषोंको जो घर के द्वार पर थे अन्धा कर दिया, सो वे द्वार को टटोलते टटोलते यक गए।
12 फिर उन पाहुनोंने लूत से पूछा, यहां तेरे और कौन कौन हैं? दामाद, बेटे, बेटियां, वा नगर में तेरा जो कोई हो, उन सभोंको लेकर इस स्यान से निकल जा।
13 क्योंकि हम यह स्यान नाश करने पर हैं, इसलिथे कि उसकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बढ़ गई है; और यहोवा ने हमें इसका सत्यनाश करने के लिथे भेज दिया है।
14 तब लूत ने निकलकर अपके दामादोंको, जिनके साय उसकी बेटियोंकी सगाई हो गई यी, समझा के कहा, उठो, इस स्यान से निकल चलो : क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश किया चाहता है। पर वह अपके दामादोंकी दृष्टि में ठट्ठा करनेहारा सा जान पड़ा।
15 जब पह फटने लगी, तब दूतोंने लूत से फुर्ती कराई और कहा, कि उठ, अपक्की पत्नी और दोनो बेटियोंको जो यहां हैं ले जा : नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा।
16 पर वह विलम्ब करता रहा, इस से उन पुरूषोंने उसका और उसकी पत्नी, और दोनोंबेटियोंको हाथ पकड़ लिया; क्योंकि यहोवा की दया उस पर यी : और उसको निकालकर नगर के बाहर कर दिया।
17 और ऐसा हुआ कि जब उन्होंने उनको बाहर निकाला, तब उस ने कहा अपना प्राण लेकर भाग जा; पीछे की और न ताकना, और तराई भर में न ठहरना; उस पहाड़ पर भाग जाना, नहीं तो तू भी भस्म हो जाएगा।
18 लूत ने उन से कहा, हे प्रभु, ऐसा न कर :
19 देख, तेरे दास पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि हुई है, और तू ने इस में बड़ी कृपा दिखाई, कि मेरे प्राण को बचाया है; पर मैं पहाड़ पर भाग नहीं सकता, कहीं ऐसा न हो, कि कोई विपत्ति मुझ पर आ पके, और मैं मर जाऊं :
20 देख, वह नगर ऐसा निकट है कि मैं वहां भाग सकता हूं, और वह छोटा भी है : मुझे वहीं भाग जाने दे, क्या वह छोटा नहीं हैं? और मेरा प्राण बच जाएगा।
21 उस ने उस से कहा, देख, मैं ने इस विषय में भी तेरी बिनती अंगीकार की है, कि जिस नगर की चर्चा तू ने की है, उसको मैं नाश न करूंगा।
22 फुर्ती से वहां भाग जा; क्योंकि जब तक तू वहां न पहुचे तब तक मैं कुछ न कर सकूंगा। इसी कारण उस नगर का नाम सोअर पड़ा।
23 लूत के सोअर के निकट पहुचते ही सूर्य पृय्वी पर उदय हुआ।
24 तब यहोवा ने अपक्की ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई;
25 और उन नगरोंको और सम्पूर्ण तराई को, और नगरोंको और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरोंके सब निवासिक्कों, भूमि की सारी उपज समेत नाश कर दिया।
26 लूत की पत्नी ने जो उसके पीछे यी दृष्टि फेर के पीछे की ओर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई।
27 भोर को इब्राहीम उठकर उस स्यान को गया, जहां वह यहोवा के सम्मुख खड़ा या;
28 और सदोम, और अमोरा, और उस तराई के सारे देश की ओर आंख उठाकर क्या देखा, कि उस देश में से धधकती हुई भट्टी का सा धुआं उठ रहा है।
29 और ऐसा हुआ, कि जब परमेश्वर ने उस तराई के नगरोंको, जिन में लूत रहता या, उलट पुलट कर नाश किया, तब उस ने इब्राहीम को याद करके लूत को उस घटना से बचा लिया।
30 और लूत ने सोअर को छोड़ दिया, और पहाड़ पर अपक्की दोनोंबेटियोंसमेत रहने लगा; क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता या : इसलिथे वह और उसकी दोनोंबेटियां वहां एक गुफा में रहने लगे।
31 तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, हमारा पिता बूढ़ा है, और पृय्वी भर में कोई ऐसा पुरूष नहीं जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए :
32 सो आ, हम अपके पिता को दाखमधु पिलाकर, उसके साय सोएं, जिस से कि हम अपके पिता के वंश को बचाए रखें।
33 सो उन्होंने उसी दिन रात के समय अपके पिता को दाखमधु पिलाया, तब बड़ी बेटी जाकर अपके पिता के पास लेट गई; पर उस ने न जाना, कि वह कब लेटी, और कब उठ गई।
34 और ऐसा हुआ कि दूसरे दिन बड़ी ने छोटी से कहा, देख, कल रात को मैं अपके पिता के साय सोई : सो आज भी रात को हम उसको दाखमधु पिलाएं; तब तू जाकर उसके साय सोना कि हम अपके पिता के द्वारा वंश उत्पन्न करें।
35 सो उन्होंने उस दिन भी रात के समय अपके पिता को दाखमधु पिलाया : और छोटी बेटी जाकर उसके पास लौट गई : पर उसको उसके भी सोने और उठने के समय का ज्ञान न या।
36 इस प्रकार से लूत की दोनो बेटियां अपके पिता से गर्भवती हुई।
37 और बड़ी एक पुत्र जनी, और उसका नाम मोआब रखा : वह मोआब नाम जाति का जो आज तक है मूलपिता हुआ।
38 और छोटी भी एक पुत्र जनी, और उसका नाम बेनम्मी रखा; वह अम्मोन्‌ वंशियोंका जो आज तक हैं मूलपिता हुआ।।

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