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Genesis - -उत्पत्ति

अध्याय : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50

1 जब यूसुफ मिस्र में पहुंचाया गया, तब पोतीपर नाम एक मिस्री, जो फिरौन का हाकिम, और जल्लादोंका प्रधान या, उस ने उसको इश्माएलियोंके हाथ, से जो उसे वहां ले गए थे, मोल लिया।
2 और यूसुफ अपके मिस्री स्वामी के घर में रहता या, और यहोवा उसके संग या; सो वह भाग्यवान्‌ पुरूष हो गया।
3 और यूसुफ के स्वामी ने देखा, कि यहोवा उसके संग रहता है, और जो काम वह करता है उसको यहोवा उसके हाथ से सुफल कर देता है।
4 तब उसकी अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई, और वह उसकी सेवा टहल करने के लिथे नियुक्त किया गया : फिर उस ने उसको अपके घर का अधिक्कारनेी बनाके अपना सब कुछ उसके हाथ में सौप दिया।
5 और जब से उस ने उसको अपके घर का और अपक्की सारी सम्पत्ति का अधिक्कारनेी बनाया, तब से यहोवा यूसुफ के कारण उस मिस्री के घर पर आशीष देने लगा; और क्या घर में, क्या मैदान में, उसका जो कुछ या, सब पर यहोवा की आशीष होने लगी।
6 सो उस ने अपना सब कुछ यूसुफ के हाथ में यहां तक छोड़ दिया: कि अपके खाने की रोटी को छोड़, वह अपक्की सम्पत्ति का हाल कुछ न जानता या। और यूसुफ सुन्दर और रूपवान्‌ या।
7 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ, कि उसके स्वामी की पत्नी ने यूसुफ की ओर आंख लगाई; और कहा, मेरे साय सो।
8 पर उस ने अस्वीकार करते हुए अपके स्वामी की पत्नी से कहा, सुन, जो कुछ इस घर में है मेरे हाथ में है; उसे मेरा स्वामी कुछ नहीं जानता, और उस ने अपना सब कुछ मेरे हाथ में सौप दिया है।
9 इस घर में मुझ से बड़ा कोई नहीं; और उस ने तुझे छोड़, जो उसकी पत्नी है; मुझ से कुछ नहीं रख छोड़ा; सो भला, मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्वर का अपराधी क्योंकर बनूं ?
10 और ऐसा हुआ, कि वह प्रति दिन यूसुफ से बातें करती रही, पर उस ने उसकी न मानी, कि उसके पास लेटे वा उसके संग रहे।
11 एक दिन क्या हुआ, कि यूसुफ अपना काम काज करने के लिथे घर में गया, और घर के सेवकोंमें से कोई भी घर के अन्दर न या।
12 तब उस स्त्री ने उसका वस्त्र पकड़कर कहा, मेरे साय सो, पर वह अपना वस्त्र उसके हाथ में छोड़कर भागा, और बाहर निकल गया।
13 यह देखकर, कि वह अपना वस्त्र मेरे हाथ में छोड़कर बाहर भाग गया,
14 उस स्त्री ने अपके घर के सेवकोंको बुलाकर कहा, देखो, वह एक इब्री मनुष्य को हमारा तिरस्कार करने के लिथे हमारे पास ले आया है। वह तो मेरे साय सोने के मतलब से मेरे पास अन्दर आया या और मैं ऊंचे स्वर से चिल्ला उठी।
15 और मेरी बड़ी चिल्लाहट सुनकर वह अपना वस्त्र मेरे पास छोड़कर भागा, और बाहर निकल गया।
16 और वह उसका वस्त्र उसके स्वामी के घर आने तक अपके पास रखे रही।
17 तब उस ने उस से इस प्रकार की बातें कहीं, कि वह इब्री दास जिसको तू हमारे पास ले आया है, सो मुझ से हंसी करने के लिथे मेरे पास आया या।
18 और जब मैं ऊंचे स्वर से चिल्ला उठी, तब वह अपना वस्त्र मेरे पास छोड़कर बाहर भाग गया।
19 अपक्की पत्नी की थे बातें सुनकर, कि तेरे दास ने मुझ से ऐसा ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का।
20 और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहां राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया : सो वह उस बन्दीगृह में रहने लगा।
21 पर यहोवा यूसुफ के संग संग रहा, और उस पर करूणा की, और बन्दीगृह के दरोगा के अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई।
22 सो बन्दीगृह के दरोगा ने उन सब बन्धुओं को, जो कारागार में थे, यूसुफ के हाथ में सौप दिया; और जो जो काम वे वहां करते थे, वह उसी की आज्ञा से होता या।
23 बन्दीगृह के दरोगा के वश में जो कुछ या; क्योंकि उस में से उसको कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती यी; इसलिथे कि यहोवा यूसुफ के साय या; और जो कुछ वह करता या, यहोवा उसको उस में सफलता देता या।

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