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Isaiah - यशायाह

अध्याय : 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66

1 सुनो, यहोवा का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि उद्धार न कर सके, न वह ऐसा बहिरा हो गया है कि सुन न सके;
2 क्योंकि तुम्हारे हाथ हत्या से और तुम्हारी अंगुलियां अधर्म के कर्मो से अपवित्र हो गई है; तुम्हारे मुंह से तो फूठ और तुम्हारी जीभ से कुटिल बातें निकलती हैं।
3 क्योंकि तुम्हारे हाथ हत्या से और तुम्हारी अंगुलियां अधर्म के कर्मोंसे अपवित्र हो गईं हैं; तुम्हारे मुंह से तो फूठ और तुम्हारी जीभ से कुटिल बातें निकलती हैं।
4 कोई धर्म के साय नालिश नहीं करता, न कोई सच्चाई से मुकद्दमा लड़ता है; वे मिय्या पर भरोसा रखते हैं और फूठ बातें बकते हैं, उसको मानो उत्पात का गर्भ रहता, और वे अनर्य को जन्म देते हैं।
5 वे सांपिन के अण्डे सेते और मकड़ी के जाले बनाते हैं; जो कोई उनके अण्डे खाता वह मर जाता है, और जब कोई एक को फोड़ता तब उस में से सपोला निकलता है।
6 उनके जाले कपके का काम न देंगे, न वे अपके कामोंसे अपके को ढाप सकेंगे। क्योंकि उनके काम अनर्य ही के होते हैं, और उनके हाथोंसे अपद्रव का काम होता है।
7 वे बुराई करने को दौड़ते हैं, और निर्दोष की हत्या करने को तत्पर रहते हैं; उनकी युक्तियां व्यर्य हैं, उजाड़ और विनाश ही उनके मार्गोंमें हैं।
8 शान्ति का मार्ग वे जानते ही नहीं और न उनके व्यवहार में न्याय है; उनके पय टेढ़े हैं, जो कोई उन पर चले वह शान्ति न पाएगा।।
9 इस कारण न्याय हम से दूर है, और धर्म हमारे समीप ही नहीं आता हम उजियाले की बाट तो जोहते हैं, परन्तु, देखो अन्धिक्कारनेा ही बना रहता है, हम प्रकाश की आशा तो लगाए हैं, परन्तु, घोर अन्धकार ही में चलते हैं।
10 हम अन्धोंके समान भीत टटोलते हैं, हां, हम बिना आंख के लोगोंकी नाईं टटोलते हैं; हम दिन-दोपहर रात की नाईं ठोकर खाते हैं, ह्रृष्टपुष्टोंके बीच हम मुर्दोंके समान हैं।
11 हम सब के सब रीछोंकी नाई चिल्लाते हैं और पण्डुकोंके समान च्यूं च्यूं करते हैं; हम न्याय की बाट तो जोहते हैं, पर वह कहीं नहीं; और उद्धार की बाट जोहते हैं पर वह हम से दूर ही रहता है।
12 क्योंकि हमारे अपराध तेरे साम्हने बहुत हुए हैं, हमारे पाप हमारे विरूद्ध साझी दे रहे हैं; हमारे अपराध हमारे संग हैं और हम अपके अधर्म के काम जानते हैं:
13 हम ने यहोवा का अपराध किया है, हम उस से मुकर गए और अपके परमेश्वर के पीछे चलना छोड़ दिया, हम अन्धेर करने लगे और उलट फेर की बातें कहीं, हम ने फूठी बातें मन में गढ़ीं और कही भी हैं।
14 न्याय तो पीछे हटाया गया और धर्म दूर खड़ा रह गया; सच्चाई बाजार में गिर पक्की और सिधाई प्रवेश नहीं करने पाती।
15 हां, सच्चाई खोई, और जो बुराई से भागता है सो शिकार हो जाता है।। यह देखकर यहोवा ने बुरा माना, क्योंकि न्याय जाता रहा,
16 उस ने देखा कि कोई भी पुरूष नहीं, और इस से अचम्भा किया कि कोई बिनती करनेवाला नहीं; तब उस ने अपके ही भुजबल से उद्धार किया, और अपके धर्मी होने के कारण वह सम्भल गया।
17 उस ने धर्म को फिलम की नाई पहिन लिया, और उसके सिर पर उद्धार का टोप रखा गया; उस ने पलटा लेने का वस्त्र धारण किया, और जलजलाहट को बागे की नाई पहिन लिया है।
18 उनके कर्मोंके अनुसार वह उनको फल देगा, अपके द्रोहियोंपर वह अपना क्रोध भड़काएगा और अपके शत्रुओं को उनकी कमाई देगा; वह द्वीपवासिक्कों भी उनकी कमाई भर देगा।
19 तब पश्चिम की ओर लोग यहोवा के नाम का, और पूर्व की ओर उसकी महिमा का भय मानेंगे; क्योंकि जब शत्रु महानद की नाईं चढ़ाई करेंगे तब यहोवा का आत्मा उसके विरूद्ध फण्डा खड़ा करेगा।।
20 और याकूब में जो अपराध से मन फिराते हैं उनके लिथे सिय्योन में एक छुड़ानेवाला आएगा, यहोवा की यही वाणी है।
21 और यहोवा यह कहता है, जो वाचा मैं ने उन से बान्धी है वह यह है, कि मेरा आत्मा तुझ पर ठहरा है, और अपके वचन जो मैं ने तेरे मुंह में डाले हैं अब से लेकर सर्वदा तक वे मेरे मुंह से, और, तेरे पुत्रोंऔर पोतोंके मुंह से भी कभी न हटेंगे।।

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